मैत्री की भावना मानव मात्र के लिए कल्याणकारी : मानवता के मसीहा महाश्रमण
- by admin
- Jan 23, 2025
-महातपस्वी आचार्यश्री ने किया लगभग 15 किलोमीटर का विहार
-चिरई नानी में स्थित शक्ति विद्यालय में पधारे शांतिदूत
जोधपुर संभाग उप संपादक पारस शर्मा चिरई नानी, कच्छ (गुजरात) :*
गुजरात की धरा को पावन बनाने और आम जनमानस के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने के लिए निरंतर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ कच्छ जिले में यात्रायित हैं। कच्छ गुजरात का वह जिला है, जिसके नाम पर नमक से युक्त विशाल मरुस्थलीय भूभाग भी है, जिसे लोग कच्छ के रण के नाम से जानते हैं।
बुधवार को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भचाऊ से मंगल प्रस्थान किया। भचाऊ की ग्राम्य जनता ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। औद्योगिक दृष्टि से अग्रणी गुजरात में राजमार्ग से बड़े-बड़े वाहनों पर भारी-भारी संयत्रों का दिखाई देना भी मानों आम बात है। आचार्यश्री का विहार आज कुछ प्रलम्ब था। मार्ग के कही ग्रामीण जनता को, कही अन्यत्र जाने वाले यात्रियों को भी आचार्यश्री के दर्शन और आशीर्वाद का लाभ प्राप्त हुआ। लगभग 15 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री चिरई नानी गांव में स्थित शक्ति विद्यालय में पधारे। विद्यालय के विद्यार्थी आचार्यश्री के समक्ष करबद्ध हुए तो आचार्यश्री ने विद्यार्थियों पर अपने दोनों करकमलों से मंगल आशीषवृष्टि की।
विद्यालय परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित श्रद्धालु जनता को मंगल संबोध प्रदान करते हुए कहा कि संस्कृत के श्लोक के माध्यम से देवता से प्रार्थना की गई है कि हे देव! मेरी आत्मा में सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की भावना रहे। गुणीजनों के प्रति प्रमोद भाव, दुःखी जीवों के प्रति करुणा परायणता और विपरीत परिस्थिति वाले में मध्यस्थ भाव रहे। ये चार भावनाएं अध्यात्म से जुड़ी हैं और व्यवहार की दृष्टि से भी इनका बहुत महत्त्व है। अगर व्यवहार में मैत्री है तो आदमी का व्यवहार कितना अच्छा हो सकता है। गुणीजनों के प्रति ईर्ष्या न होकर प्रमोद की भावना हो, दुखियों के प्रति करुणा की भावना और विपरीत आचरण करने वाले के प्रति तटस्थ भाव रहे। सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना और किसी से भी वैर भाव का न होना सर्वोच्च गुण माना जा सकता है। मैत्री भाव की पृष्ठभूमि अहिंसा है। हालांकि शरीरधारी के लिए पूर्णतया अहिंसा का पालन काफी मुश्किल होता है। साधु से भी किसी न किसी रूप में हिंसा हो सकती है। विहार के दौरान होने वाली वर्षा के लगने से हिंसा तो हो ही सकती है। शौचाचार के लिए निकला साधु हरियाली पर भी जाए तो हिंसा हो सकती है। इसलिए कहा गया कि पूर्णतया हिंसा से बचकर रहना कठिन कार्य होता है।
कभी ऐसी हिंसा तो हो जाए, लेकिन जानबूझकर किसी प्राणी की हत्या न हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। सभी प्राणियों और जीवों के प्रति मैत्री की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। इससे अहिंसा का पालन अच्छा हो सकता है। मन, वचन और काय से किसी भी प्रकार की हिंसा न हो, अहिंसा की साधना होती रहे तो मैत्री का मानों वह हृदय बन सकता है। किसी की आध्यात्मिक सेवा और किसी की लौकिक सेवा भी की जा सकती है। आदमी को दूसरों के हित का चिंतन करना चाहिए। आदमी को किसी के साथ भी वैर का भाव नहीं रखना चाहिए, सभी के प्रति मैत्री की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति मैत्री की भावना का विकास करने का प्रयास होता रहे। मैत्री की भावना से चित्त को भावित रखना मानव मात्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है।
शक्ति विद्यालय के ट्रस्टी श्री सुरेशभाई ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया जोधपुर संभाग उप संपादक पारस शर्मा.9351448065
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